सूरए यूनुस की आयत क्रमांक 16 और 17 का अनुवादः
(हे पैग़म्बर!) कह दीजिए कि यदि ईश्वर चाहता तो मैं इस क़ुरआन की तुम्हारे समक्ष तिलावत न करता और न तुम्हें इससे अवगत कराता। मैंने इससे पूर्व तुम्हारे बीच आयु बिताई है, क्या तुम चिंतन नहीं करते? तो उससे बड़ा अत्याचारी कौन होगा जो ईश्वर पर लांछन लगाए या उसकी आयतों को झूठा बताए? निश्चित रूप से अपराधियों को कल्याण प्राप्त नहीं होगा।
संक्षिप्त टिप्पणी:
जो लोग पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम से क़ुरआने मजीद में परिवर्तन की मांग कर रहे हैं वस्तुतः वे क़ुरआने मजीद की आयतों को झुठलाते और ईश्वर पर आरोप लगाते हैं कि जो ईश्वर, पैग़म्बर और क़ुरआन के प्रति सबसे बड़ा अत्याचार है।
इन आयतों से मिलने वाले पाठ:
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आसमानी किताबें, ईश्वरीय संदेश हैं न कि पैग़म्बरों के विचारों या अन्य लोगों की शिक्षाओं का परिणाम।
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सबसे बड़ा अत्याचार सांस्कृतिक अत्याचार और धार्मिक व आस्था संबंधी वास्तविकताओं में फेर बदल करना है।